Saturday, January 2, 2010

फिर भी हम कहेंगे--------

हॉल मैं ही एक फिल्म "थ्री इडियट " देखने में आई जिसमे एक विशेष सन्देश दिया गया था कि अपने कार्यो को अपनी रूचि के अनुसार चुने । वैसे तो हर आदमी से आशा की जाती है कि उसे अपने कार्यो को पूजा की तरह करना चहिये लेकिन आज के दौर में पूजा को भी कार्य की तरह करते देखा गया है । जिसमे ईश्वर के प्रति कृतज्ञता या भाव की अनुपस्थिति होती है, यदि वहां कुछ होता भी है तो सिर्फ और सिर्फ "चाह" ।
यदि यथार्थ के कठोर धरातल पर खड़े हो कर हम अपने व्यक्तिगत पहलुओ को ध्यान दे, तो पाएंगे की बहुतायत में हमारे कर रहे काम और हमारी चाह का काफी कम 'मैच' होता है। कभी हमारी चाह हमारी व्यक्तिगत क्षमताओ से ज्यादा होती है या हमारी
क्षमताओ का सही इस्तेमाल न होने से कार्य छोटा लगता है । यह कहता रहा गया है कि
" कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ,
कही जमी तो कही आंसमा नहीं मिलता "
मेरी सोच में , हमें यही करना चाहिए जो कार्य हमारे हाथ में है उसे दिल से कुछ नया सिखने के उत्साह लिए करे और वह ढूंढे जिसे हमारे दिल को तलाश है, ना कि हमारे दिमाग को । यहाँ एक धार्मिक पुस्तकों के मेले में पता लगा कि उनके पूज्य गुरुदेव जिन्होंने वे पुस्तके लिखी थी वे संसार की समस्याओ का चिंतन कर इतना दुखी हो जाते कि सुबह उठने पर उनका तकिया आंसुओ से भीगा होता था । कमबख्त!! आज के ज़माने में तो हमारे आंसू भी नगरपालिका के नल सप्लाई कि तरह हो गए है जिन्हें पिया तो जा सकता है लेकिन बहाया नहीं जा सकता।
लेकिन फिर भी हम कहेंगे
"ALL IS WELL"

7 comments:

  1. Hi Ajay
    ब्लॉग की दुनिया में स्वागत है . मैंने भी ब्लॉग चालू किया है पर लिखना नहीं आता .
    खेर मै हाल फ़िलहाल दो ब्लॉग follow करूँगा तुम्हारा ओंर डॉ लोकरे का
    दोनों अपने आप मै ज्ञान के सागर हो . मुझे कुछ साल पहले का वाकया याद आ रहा है जब तुम्हारे और लोकरे साब की
    फिलासफी के बारे मै बात करते समय मैंने नाम दिया था तुम्हारा स्वामी अजयानंद और डॉ साब का स्वामी अभयानंद ...
    मेरी शुभकामनाये सदा तुम्हारे साथ रहेगी
    प्रवीण दुबे

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  2. पहली ही गेंद पर छक्का तो मत मारो ................

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  3. waah ajaybhai, blogbaaz ban gaye; all be well for you in 2010, maalik aapko Balaghat mein milen naye sal mein. shubhkamnayein.

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  4. waahwa 2010 shuru karne ke liye great blog....!
    abhi tak ke 3idiots nahi dekhi lekin kam se kam LAKSHYA movie ka to reference le hi sakta hun...
    "Ghass kaato lekin acchi ghass kaato"
    ye naseehat jo di jaati hai hero ko jise samajh nahi aata ki use karna kyaa hai.... ghass ki baat ka gyaan yahi nikalta hai ki jo kaam karo accha karo... bhale hi wo choota sa ghaass kaatna hi kyon na ho !

    main to ye bhi add karunga ki agar ghass kaatna hai to isliye mat rkna ki saamne waala bhi ghass kaat raha hai to log mujhe copybaaz na bolein ...
    Jai Ajayaanand !

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  5. agla comment will follow after i watch movie... stay tuned

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  6. Shriman ji ke is naye varsh ke naye andaz dekhkar hum to glad ho gaye.
    Aapme yeh kala hai hamein maloom hua.
    isi tarah aap likhte rahein.....intezaar mein...
    Taki padkar hum kahein ki... AALL IS WELL.
    TAJINDER GANDHI

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  7. बात सही कही है फिल्म मे ...
    मेरे ख्याल से ज्यादातर लोगो को पता ही नहीं चल पता की उसकी रूचि किस काम मे है .. और जब अहसास होता है तब तक जिंदगी गुजर जाती है
    जिन्हें पता होता है वो शायद उसे पा लेते है ...
    बाकी सब भीड़ मे वो काम करते रहते है जो वो करना नहीं चाहते

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