हॉल मैं ही एक फिल्म "थ्री इडियट " देखने में आई जिसमे एक विशेष सन्देश दिया गया था कि अपने कार्यो को अपनी रूचि के अनुसार चुने । वैसे तो हर आदमी से आशा की जाती है कि उसे अपने कार्यो को पूजा की तरह करना चहिये लेकिन आज के दौर में पूजा को भी कार्य की तरह करते देखा गया है । जिसमे ईश्वर के प्रति कृतज्ञता या भाव की अनुपस्थिति होती है, यदि वहां कुछ होता भी है तो सिर्फ और सिर्फ "चाह" ।
यदि यथार्थ के कठोर धरातल पर खड़े हो कर हम अपने व्यक्तिगत पहलुओ को ध्यान दे, तो पाएंगे की बहुतायत में हमारे कर रहे काम और हमारी चाह का काफी कम 'मैच' होता है। कभी हमारी चाह हमारी व्यक्तिगत क्षमताओ से ज्यादा होती है या हमारी क्षमताओ का सही इस्तेमाल न होने से कार्य छोटा लगता है । यह कहता रहा गया है कि
" कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ,
कही जमी तो कही आंसमा नहीं मिलता "
मेरी सोच में , हमें यही करना चाहिए जो कार्य हमारे हाथ में है उसे दिल से कुछ नया सिखने के उत्साह लिए करे और वह ढूंढे जिसे हमारे दिल को तलाश है, ना कि हमारे दिमाग को । यहाँ एक धार्मिक पुस्तकों के मेले में पता लगा कि उनके पूज्य गुरुदेव जिन्होंने वे पुस्तके लिखी थी वे संसार की समस्याओ का चिंतन कर इतना दुखी हो जाते कि सुबह उठने पर उनका तकिया आंसुओ से भीगा होता था । कमबख्त!! आज के ज़माने में तो हमारे आंसू भी नगरपालिका के नल सप्लाई कि तरह हो गए है जिन्हें पिया तो जा सकता है लेकिन बहाया नहीं जा सकता।
लेकिन फिर भी हम कहेंगे
"ALL IS WELL"
Saturday, January 2, 2010
Friday, January 1, 2010
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